गंगा के तट पर स्नान के लिए गए एक हिंदू संत ने देखा कि एक परिवार आपस में क्रोधित होकर चिल्ला रहा है। उन्होंने अपने शिष्यों की ओर मुस्कुराते हुए देखा और पूछा:
"जब लोग गुस्से में होते हैं तो वे एक-दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं?"
शिष्यों ने कुछ देर सोचा। एक ने उत्तर दिया:
"क्योंकि हम अपना धैर्य खो देते हैं, इसलिए चिल्लाते हैं।"
संत ने फिर पूछा:
"लेकिन जब दूसरा व्यक्ति आपके पास ही है, तो चिल्लाने की क्या आवश्यकता? आप अपनी बात धीरे से भी कह सकते हैं।"
शिष्यों ने और भी उत्तर दिए, लेकिन कोई भी उत्तर उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाया। तब संत ने अपनी बात समझाई:
"जब दो लोग गुस्से में होते हैं, तो उनके दिल एक-दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं। उस दूरी को पाटने के लिए उन्हें चिल्लाना पड़ता है, ताकि उनकी आवाज़ एक-दूसरे तक पहुंच सके। जितना अधिक गुस्सा होता है, उतनी ही अधिक दूरी होती है, और उतना ही तेज़ चिल्लाना पड़ता है।
लेकिन जब दो लोग प्यार में होते हैं, तो वे धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल बहुत करीब होते हैं। उनके बीच की दूरी बहुत कम या बिल्कुल नहीं होती। और जब उनका प्यार और गहरा हो जाता है, तो वे फुसफुसाकर बात करते हैं। और जब प्यार चरम पर होता है, तो उन्हें बोलने की भी आवश्यकता नहीं होती—सिर्फ एक नज़र ही उनके भाव व्यक्त कर देती है। उनके दिल इतने करीब होते हैं कि शब्दों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।"
संत ने शिष्यों की ओर देखा और कहा:
"इसलिए, जब भी बहस करो, अपने दिलों को दूर मत होने दो। ऐसे शब्द मत कहो जो तुम्हें और दूर कर दें। वरना, ऐसा दिन भी आ सकता है जब दूरी इतनी बढ़ जाएगी कि वापस लौटने का रास्ता ही नहीं मिलेगा।"
अद्भुत! ₹3 लाख प्रति माह तनख्वाह को त्याग एक आईआईटी ग्रैजुएट बने संत | अभय सिंह डिप्रेशन दुखद पारिवारिक संघर्षों से जूझते रहे
लेखक: आर्यन राणा, संस्थापक, VRIGHTPATH इस दुनिया में, जहाँ शैक्षणिक सफलता को अक्सर जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, वहाँ अभय सिंह की यात्रा, जिन्हें लोकप्रिय रूप से इंजीनियर बाबा के नाम से जाना जाता है, एक नई दिशा दिखाती है। अभय सिंह, जो IIT बॉम्बे से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्नातक हैं, ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आकर्षण को छोड़कर आध्यात्मिकता का मार्ग अपनाया। उनका जीवन यह दिखाता है कि शिक्षा और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। IIT से स्नातक और डिज़ाइन में मास्टर डिग्री प्राप्त करने के बाद, उन्होंने दिल्ली और कनाडा की शीर्ष कंपनियों में काम किया, जहां उनकी तनख्वाह ₹3 लाख प्रति माह थी। बावजूद इसके, वे डिप्रेशन से जूझते रहे और जीवन का गहरा उद्देश्य खोजने के लिए आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हुए। भारत लौटकर उन्होंने मनाली, शिमला और हरिद्वार जैसे आध्यात्मिक स्थलों की यात्रा की और अंततः श्री पंचदशनाम जुना अखाड़ा का हिस्सा बनकर अपने उच्च वेतन वाले एयरोस्पेस इंजीनियरिंग करियर को त्याग दिया। अभय का बचपन घरेलू हिंसा और पारिवारिक संघर्षों से भरा था। इस कठिन अतीत ने उ...

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